पश्चिमी चम्पारणबिहार

लोटस विद्यालय के प्रांगण में मनाया गया डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती।

नरकटियागंज (प.च)।

आज दिनांक – 03/12/2020 को संपूर्ण जीवन भारतीय मूल्यों , आदर्शों , राष्टीयता, ईमानदारी और भारतरत्न से सम्मानित देश के प्रथम राष्ट्रपति डाँ. राजेंद्र प्रसाद की जयंंती लोटस विधालय के प्रांगण में तैल्य चित्र पर माल्यार्पण , पुष्प और दीप जलाकर हर्षोल्लास के साथ मनाई गई जिसकी जानकारी स्कूल के निर्देशक आशीष रत्न उर्फ गोलू ने दी जबकि अध्यक्षता शोभा सिंन्हा स्मृति ट्रस्ट के संस्थापक सचिव अवध किशोर सिन्हा ने की और संचालन अतुल कुमार ने की। अवध किशो सिंन्हा ने बताया कि उन्होंने बताया कि डाँ. राजेंद्र प्रसाद की फोटो पर माल्यार्पण कर उनकी जीवनी के बारे मे संबोधित करते हुए कहा कि राजेन्द्र बाबू का जन्म 3 दिसंबर, 1884 ई. को बिहार के सीवान जिला स्थित जीरादेई नामक गाँव में हुआ था । सन् 1950 में देश के गणतंत्र (Republic) घोषित होने पर देश के प्रथम राष्ट्रपति चुने गए । अपनी सादगी औरसरलता से किसी को भी प्रभावित कर देने वाले विद्वान थे डॉ राजेन्द्र प्रसाद । इन्हें हम आदर से राजेन्द्र बाबू कहते हैं । स्वाधीन भारत के सर्वप्रथम राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए भी अहंकार (Ego) से पूरी तरह मुक्त रहने वाले और किसान जैसी वेशभूषा में रहने वाले व्यक्ति थे राजेन्द्र बाबू ।स्कूल के निदेशक आशीष रत्न ने बताया कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद भारतीय जनता के सच्चे प्रतिनिधि थे । इतना बड़ा पद पाकर भी वे नम्रता व सादगी के अवतार थे । उनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय मूल्यों, आदर्शों एवं राष्ट्रियता की अद्‌भुत मिसाल था । वे सरलता, कर्तव्यनिष्ठा व ईमानदारी के पर्याय थे । डॉ० राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्र के सच्चे सेवक थे । समय के बड़े ही पाबन्द थे । निश्चित समय में फाइलों का काम निबटा लेते थे । अध्ययन के लिए भी समय निकाल लेते थे । दिन-भर का समय लोगों से मिलने-जुलने तथा सार्वजनिक कार्यों में देते थे । छोटे-से-छोटे लोगों से बड़े ही प्रेमपूर्वक मिलते थे और उनकी समस्याओं का समाधान भी करते थे ।

संचालन करते हुए अतुल कुमार ने बताया कि देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनका विशेष योगदान था । डॉ० राजेन्द्र प्रसाद इतने सरल थे कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी अभिमान उन्हें छू तक नहीं गया था । एक बार तो उन्होंने अपने घर के नौकर को डांटने के बाद अपनी गलती जानकर माफी तक गांग ली । जनसेवी इतने थे कि उनकी कोई मिसाल नहीं थी ।दीपक कुमार चित्रगुप्त ने बताया कि सन 1962 में अपने राजनैतिक और सामाजिक योगदान के लिए उन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से नवाजा गया। वे एक विद्वान,प्रतिभाशाली, दृढ़ निश्चयी और उदार दृष्टिकोण वाले व्यक्ति थे। उनकी एग्जाम शीट को देखकर एक एग्जामिनर ने कहा था कि ‘The Examinee is better than Examiner’ । 28 फरवरी 1963 को वे हमसभी को छोडकर चले गए । वे हमारे बीच नही रहे लेकिन उनका आदर्श , जीवन , सादगी , त्याग , सेवा भावना , कर्तव्यनिष्ठा सदा हमारे लिए पथप्रदर्शक तथा अनुकरणीय रहेगें ।

स्कूल के उच्च वर्गों के छात्र -/ छात्राओं की उपस्थित रही और सभी ने ध्यान से उनकी जीवनी को सुना । मौके पर अवध किशोर सिन्हा , आशीष रत्न , अतुल कुमार , रत्नेश श्रीवास्तव सचिव , दीपक कुमार चित्रगुप्त , .शिवा प्रसाद , अखिलेश कुमार सिंह , पंकज शर्मा , सागर डे , कौशलेंद्र कुमार झा , फिरोज अंसाफरी , मनीष कुमार प्रीति कुमारी आर्य , दीपक कुमार गुप्ता आदि की उपस्थिति रही ।